Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | 

    "Kabir Ke Dohe-कबीर के दोहे" प्राचीन भारतीय साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिनमें संत कबीर ने जीवन के अद्भूत तथा गहरे तात्त्विक सिद्धांतों को सुंदरता से व्यक्त किया है। 

    Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग  इस पोस्ट में, हम आपको कबीर के प्रमुख दोहों (१ -१०) के साथ उनके अर्थों के साथ परिचित कराएंगे। कबीर के दोहे में ज्ञान, भक्ति, नैतिकता, और मानवता के मूल सिद्धांतों का सुंदर रूप से वर्णन है, जो आज भी हमारे जीवन में महत्वपूर्ण हैं। इस अद्भुत साहित्य को समझकर, हम अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन कर सकते हैं और सही मार्ग पर चल सकते हैं।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | दोहा १  |

दीपक पावक आँणिया, तेल भी आँण्या संग । 

तीन्यूँ मिलि करि जोइया, (तब) उड़ि- उड़ि पड़ें पतंग || १ || 

शब्दार्थ-

पावक आग, आँणिया = लाया, जोइया = जला दिया। 

व्याख्या - 

    गुरु ने ज्ञान का दीपक, विरह की आग और प्रेम-स्नेह के तेल का प्रबन्ध किया। तीनों को मिलाकर सद्गुरु ने दीप को जला दिया। अब इस दीपक में विषय-वासना रूपी पतिंगे टूट-टूट कर गिर रहे हैं। ज्ञान, विरह और प्रेम से निर्मित इस दीपक की लौ में मुमुक्ष आत्माएँ आकृष्ट होकर अपनी विषय-वासनाओं को जलाकर ईश्वर से तदाकार हो रही हैं।

    इस साखी में सांगरूपक का अच्छा निर्वाह किया गया है। रूपकातिशयोक्ति का भी प्रयोग है। 'उड़ि-उड़ि' में पुनरुक्ति प्रकाश है। 

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | दोहा २  |

मार्या है जे मरैगा, बिन सर थोथी भालि । 

पड्या पुकारै ब्रिछ तरि, आजि मरै कै काल्हि ।। २ ।। 

शब्दार्थ - 

थोथी = कोरी, ब्रिछ = वृक्ष, काल्हि = कल । 

व्याख्या - 

    जो बिना शर (फाल, मुठिया) के केवल भाले (बाण का अगला नुकीला भाग) से मारा गया है, वह वृक्ष के नीचे पड़ा-पड़ा पुकार रहा है। पीड़ा से कराह रहा है। बिना शर के अनी निकाली नहीं जा सकती है। इसलिए उसका मरना लगभग निश्चित है। वह आज मरता है या कल अर्थात् अधिक दिनों तक उसके जीवित रहने की उम्मीद नहीं है। इस साखी में गुरु के शब्द (ज्ञानोपदेश) के गहन प्रभाव को बाण के नोक की आन्तरिक चुभन से व्यंजित किया गया है। 

    'मरने' का तात्पर्य जीवन मृत होने से है। कबीर ने वृक्ष के नीचे तड़पते हुए साधक का बिम्ब प्रस्तुत कर दिया है। रूपक और विभावना की सुन्दर योजना के साथ ही शब्दों के लाक्षणिक प्रयोग उल्लेखनीय हैं। विशेषतया मार्या, मरैगा और मरै आदि । 

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | दोहा ३  |

हिरदा भीतरि दौं बलै, धूंवाँ प्रगट न होइ । 

जाकै लागी सो लखें, कै जिहि लाई सोइ || ३ || 

शब्दार्थ-

हिरदा = हृदय, दौं = दावाग्नि, बलै = जलती है, जिहि = जिसने, लाई : जलाई ।

व्याख्या- 

    कबीरदास कहते हैं कि ईश्वर के प्रेमी के हृदय में विरह की दावाग्नि जलती रहती है। इस विचित्र आग से निकलने वाला धूम बाहर से दृष्टिगोचर नहीं होता। इस आग की प्रज्वलनशीलता की अनुभूति या तो वह करता है जिसने इसे जलाया है या वह करता है जिसके अन्तःकरण में यह जल रही है। व्यतिरेक और विभावना के द्वारा विरह की विचित्र आग का चित्रण किया गया है जो अलौकिक होने के कारण अदृश्य और अनुभूतिगम्य है। इसका अनुभव ईश्वर या शिष्य, दो को ही होता है। गुरु भी ईश्वर का ही रूप है। इसलिए वह भी इसका पूर्ण अनुभव रखता है। 

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | दोहा ४   |

झल ऊठी झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। 

जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति ।। ४ ।। 

शब्दार्थ-

झल = ज्वाला, झोली = भीख माँगने का थैला, खपरा = खप्पर, बिभूति= राख । 

व्याख्या-

    ज्ञान विरह की ज्वाला प्रस्फुटित होने से योगी की झोली जल गयी उसका खपरा भी आग की तेज ऊष्मा से फूट गया। योगी अपने स्वरूप में लीन हो गया। उसका अहंकार नष्ट हो गया। आसन पर केवल राख शेष रह गयी। कथन का अभिप्राय यह है कि ज्ञान के जागृत होने पर वेशभूषा तथा सांसारिक आवश्यकताओं की उपादेयता नष्ट हो जाती है। उसका सांसारिक अस्तित्त्व समाप्त हो जाता है। 

    यहाँ ‘झोली’ संचित कर्मों का और 'खपरा' क्रियमाण-कर्मों का प्रतीक है। इनके नष्ट होने पर जीव ईश्वर रूप हो जाता है। सांगरूपक तथा रूपकातिशयोक्ति अलंकारों की अनूठी योजना दर्शनीय है। गीता में कहा गया है-'ज्ञानाग्निः सर्व कर्माणि भस्म सात्कुरुतेऽर्जुन' अर्थात् ज्ञान की अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है। 

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | दोहा ५  |

अगनि जु लागी नीर मैं, कंदू जलिया झारि । 

उत्तर दक्षिण के पंडिता, रहै? बिचारि बिचारि ।। ५ ।। 

 शब्दार्थ-

    नीर = पानी, कंदू = कीचड़, झारि = ज्वाला से। 

व्याख्या-

   पानी   में आग लग गई है। ज्वाला से सम्पूर्ण कीचड़ जल गया है। उत्तर-दक्षिण के पंडित विचार कर रहे हैं किन्तु उन्हें इसका मर्म ज्ञात नहीं हो पा रहा है। इस साखी में उलटवाँसी शैली का प्रयोग किया गया है। नीर आत्मा का प्रतीक है। इस प्रतीक का निर्माण गुण-धर्म के आधार पर किया गया है। आत्मा नीर की तरह शुद्ध और शीतल है। दैहिक, दैविक और भौतिक तापों के प्रभाव से अछूता। इस पर विषय वासनाओं का कीचड़ ऊपर से मिल गया है। यह आवरण-विक्षेप रूप माया से लिप्त दृष्टिगत होती है। 

    ज्ञान-विरह की आग की ज्वाला में विषय-वासनाओं के कीचड़ जल जाते हैं। उत्तर और दक्षिण के पंडित इस उलटवाँसी के अर्थ को बहुत चिन्तन करने के बाद भी नहीं समझ पाते हैं। (तिवारी-उत्तर दक्षिण के पंडित इसका विचारकरते करते मर गए अर्थात्पराजित हो गए।) इसके प्रतीकार्थ को समझने वाले सन्तों के लिए यह सहज ही बोधगम्य है। असंगति, पुनरुक्तिप्रकाश तथा सम्वन्धातिशयोक्ति अलंकारों का विधान परिलक्षित होता है। 

    कबीर इस तरह की उलटवाँसियों के द्वारा पंडितों के ज्ञान को चुनौती देना चाहते हैं। इस साखी में दो वैचित्र्य हैं पहला यह कि आग पानी में लगती है, दूसरा जहाँ आग लगती है उसे छोड़कर कीचड़ को जलाती है। कीचड़ रहता भी है मानस के अवचेतन में अर्थात् गहरे दूषित संस्कार ज्ञान विरह की आग में जल जाते हैं। 

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | दोहा ६  |

दौ लागी साइर जल्या, पंषी बैठे आइ । 

दाधी देह न पालवै, सतगुर गया  लगाइ ।। ६ ।। 

शब्दार्थ 

साइर = सागर, पंषी=पक्षी, दाधी = जली, पालवै = पल्लवित परिपुष्ट ।

व्याख्या-

    अन्तःकरण रूपी सागर में ज्ञान-विरह की आग लग गयी है। अर्थात् सागर जलने लगा है। विषय वासना रूपी पक्षी इसके किनारे इस आशा में बैठे हैं कि इसकी पूर्व स्थिति होगी और फिर हम अन्तःकरण रूपी सागर में विहार करेंगे। कबीर कहते हैं कि ज्ञान विरह से जली हुई शरीर पुनः पल्लवित या परिपुष्ट नहीं होती। 

    सद्गुरु द्वारा लगाई गयी ज्ञान विरह की आग देह के अन्तर निरन्तर जलती ही रहेगी । अतः विषय वासनाओं को इसके पास फटकने का मौका मिल ही नहीं सकेगा । - इस साखी में रूपकातिशयोक्ति तथा व्यतिरेक की योजना की गयी है। यह भी कबीर की उलटवाँसी का एक नमूना है। 

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | दोहा ७   |

गुर दाधा चेला जल्या, बिरहा लागी आगि । 

तिणका बपुड़ा ऊबऱ्या, गलि पूरे कै लागि ।।७।।

शब्दार्थ - 

दाधा = जल गया, तिणका = तिनका, सूक्ष्म तत्त्व, गलि = गलकर, पूरे = पूर्ण ब्रह्म

व्याख्या - 

    विरह की आग से गुरु और शिष्य दोनों जल गये । अर्थात् गुरु की गुरुता और शिष्य का शिष्यत्व दोनों समाप्त हो गया। उनमें विराजित सूक्ष्म आत्म-तत्त्व पूर्ण-ब्रह्म से मिल गया । इसीलिए वह जलने से बच गया। इस साखी में उलटवाँसी शैली है। विरह की आग से स्थूल का नाश होता है और सूक्ष्म तत्त्व शेष रह जाता है। जबकि सामान्यतः आग लगने से तिनका पहले जलता है। 

    शब्दों की पारस्परिक अर्थ-संगति प्रतीकार्थ से ही बन पाती है। 'तिणका' जीव के अणुत्व तथा न डूबने की शक्ति का परिचायक है। 'दाधा' तथा 'जल्या' शब्दों की योजना द्रष्टव्य है। दाधा गुरु के लिए है जो तत्त्वज्ञ होने के कारण विरह की आग की जलन का अनुभव शिष्य की तुलना में कम करता है। शिष्य तो विषय वासनाओं में लिप्त रहता है इसलिए उसे तीव्र ज्वलनशीलता से गुजरना पड़ता है। इस साखी में रूपकातिशयोक्ति अलंकार का विधान है। 

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | दोहा ८   |

आहेड़ी दौं लाइया, मृग पुकारै रोइ । 

जा बन में क्रीला करी, दाझत है बन सोइ ।।८।। 

शब्दार्थ – 

आहेड़ी = शिकारी (गुरु), दौं = विरहाग्नि । 

व्याख्या – 

    शिकारी गुरु ने वासना-युक्त मनोदेहात्मक जंगल में ज्ञान-विरह की आग लगा दी। वासना रूपी मृग रो-रोकर पुकार करने लगे कि जिस मानस वन (अन्तःकरण) में हमने क्रीड़ा किया है वही आग से जल रहा है। ज्ञान विरह के प्रभाव को व्यंजित करने के लिए जलते हुए वन तथा उसमें करुण पुकार करते हुए मृगों के सार्थक बिम्ब का आश्रय लिया गया है। सम्पूर्ण साखी में अन्योक्ति का विधान द्रष्टव्य है। चूँकि उपर्युक्त उपमान रूढ़ है, इसलिए प्रतीक शैली का प्रयोग भी माना जा सकता है ।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | दोहा ९   |

पाणी मॉंहै परजली, भई अपरबल आगि।

बहती सलिता रहि गई, मंछ रहे जल त्यागि।। ९ ।।

शब्दार्थ

पाणी=पानी, विशुद्ध चेतना, प्रजली=ज्ञान की आग प्रज्वलित हो गई, अप्रबल= महान शक्ति, मंछ = मछलियां। 

व्याख्या 

    ज्ञान विरह की आग विशुद्ध चेतना रूपी जल में लग कर अत्यन्त प्रबल हो गयी। विषय-वासना रूपी मछलियाँ जलते हुए जल को छोड़कर अलग हो गयीं अब केवल विशुद्ध जल प्रवाह ही शेष रह गया है। चेतना अखण्ड एवं सतत् प्रवाहमान है जिसे शुद्ध सरिता से व्यंजित किया गया है। यह बंधन की आसक्ति से रहित होकर भी सोपाधिक चैतन्य प्रवाह-रूप होता है । 

    पानी और जल के विरोधी गुणों को एक साथ रखकर उलटवाँसी का चमत्कार पैदा किया गया है। इसकी शैली प्रतीकात्मक है। अगली साखी में मंछ जीवात्मा का प्रतीक बनकर आया है। इस दृष्टि से देखा जाय तो दूसरी पंक्ति का एक भिन्न अर्थ होगा। विषय-वासना रूपी सरिता तो रह गई, इन्द्रियों का काम समाप्त हो गया और जीवात्मा जल को त्याग कर अलग हो गयी। 

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | ज्ञान विरह का अंग | दोहा १०  |

समन्दर लागी आगि, नदियाँ जलि कोइला भई । 

देखि कबीरा जागि, मंछी रूषाँ चढ़ि गईं ।। १० ।।


शब्दार्थ – 

समन्दर = समुद्र, कोइला = कोयला, मंछी = मछलियाँ । 

व्याख्या - 

    कबीरदास (Kabirdas) कहते हैं कि विषयासक्त अन्तःकरण रूपी सागर में ज्ञान-विरह की आग लग गयी, फलतः विषय वासनाओं का संवहन करने वाली नदी रूपी इन्द्रियाँ जलकर नष्ट हो गयीं। इन्द्रियों का कार्य व्यापार हो गया। कबीर ने जागृत होकर देखा कि जीवात्मा रूपी मछली सहस्रार चक्र के वृक्ष पर चढ़ गयी है। 

    इसकी योग परक व्याख्या इस प्रकार है - मूलाधार चक्र में स्थित कुण्ड में चण्डाग्नि प्रज्वलित हो गई और इड़ा-पिंगला रूपी नदियों का प्रवाह समाप्त हो गया। कुण्डलिनी शक्ति रूपी मछली सहस्रार कमल में ऊर्ध्वगमित कर गयी रूपकातिशयोक्ति और सांगरूपक की आलंकारिक योजना दर्शनीय है।

अन्य पढ़े  - Read  More 

  1. गुरुदेव का  अंग 
  2. सुमिरण  का अंग 
  3. विरह का अंग 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ